दीपावली क्या है और किस दिन मनाया जाता है|
दीपावली हिंदु धर्म को मानने वालो का विशेष पर्व है, इस महापर्व को दीपो का पर्व भी कहा जाता है, इस पर्व को प्रति वर्ष शरद ऋतु के कार्तिक मास के अमावस्या मे मनाया जाता है जो अक्टुबर नवंबर मे आता है |दीपावली दीपो का पर्व है जो इंसानो के मन मे उत्पन्न होने वाले निराशाजनक अंधकार को दूर कर खुशी और उत्साह का संचार करते है,पाप के अंत और पुण्य के जीत का महापर्व है दीपावली |
दिवाली पर्व के पौराणिक कथाएं|
दीपावली festival को हिंदु धर्म में अधर्म के अंत और धर्म के उदय का पर्व माना जाता है, क्योकि कई ऐसे पौराणिक कथाएं है, जो दीपावली पर्व कि महत्व को हमे बताती है जिसमें सभी पौराणिक कथाओं मे पाप और पुण्य के आपसी संघर्ष मे पुण्य के विजय और पाप के अंत के कहानी बताती है|
1. श्री राम के वनवास से आयोध्या आगमन-
रामायण के अनुसार जब श्री राम ,माता सीता और लक्ष्मण रावण का वध करके वनवास से वापस आयोध्या लौटे तो आयोध्या मे निवास करने वाले प्रजाजन बहुत खुश हुए, अपने खुशी को उजागर करते हुए सभी ने पुरे आयोध्या नगरी को दीपो से सजा दिये चारो तरफ रौशनी से सारा नगर जगमगा उठा, लोग उत्साह से खुशियाँ मनाने लगे , उस दिन दीपो का उत्सव मनाया गया तभी से इस पर्व का परम्परा चली आ रही है|
2. श्री कृष्णा के द्वारा नरकासुर का वध-
द्रोपर्युग मे एक असुर था जिनका नाम नरकासुर था, वह बहुत अत्याचारी और क्रूर था , उस असुर ने 16,100 कन्याओ को कैद कर लिया था उस समय द्वारका नगरी का राजा भगवान श्री कृष्ण थे जो पाप के प्रतिकार करने हेतु धरती मे अवतरित हुए थे, दुखियों और पीड़ितों के प्रार्थना सुनकर श्रीकृष्ण ने असुर नरकासुर का वध कर उन 16,100 कन्याओ को मुक्त किया |नरकासुर वध के पश्चात उन स्त्रियो ने दीपक जलाकर श्रीकृष्ण का धन्यवाद व्यापित किया|इस दिन को नरक चतुर्थी के रुप मे भी मनाया जाता हैं|
3.समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी, कुबेर व आयुर्वेदाचार्य धनवंतरी का प्रकट होना-
पौराणिक काल देवताओ और असुरो ने मिलकर अमृत प्राप्ति हेतु समुद्र मंथन किया जिसमें धन कि देवी लक्ष्मी जी , कुबेर व अमृत लिए हुए आयुर्वेदाचार्य धनवन्तरी प्रकट हुए, देवी लक्ष्मी धन, वैभव व ऐश्वर्य कि देवी मानी जाती है, देवी लक्ष्मी के प्रकट होने से तीनों लोक धन धान्य से संपन्न हो गये, माता लक्ष्मी का दीप जला कर अभिनंदन किया जाने लगा और खुशियाँ मनाये
4.हिरण्य कश्यप वध-
विष्णु पुराण मे हिरण्यकश्यप वध का उल्लेख मिलता है, भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद के जीवन रक्षा करने हेतु भगवान नर्सिह का अवतार लिया था हिरण्यकश्यप प्रहलाद के पिता व अधर्मी राजा थे उन्होंने प्रहलाद व नगर वासियों को भगवान विष्णु के स्थान अपने पूजा करवाने के लिए विवश करते थे, प्रहलाद भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे उन्होंने अपने पिता के बात को मानने से इंकार कर दिया, क्रोधवस हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने का प्रयास किया, तभी स्तंभ से भगवान नर्सिह प्रकट हुए और उनका वध किया, नगरवासी प्रसन्न होकर घी के दीपक जलाकर उत्सव मनाने लगे|
5.राजा बलि कथा-
राजा बलि असुरो का राजा था वह महा प्रतापी व दनशील था उनके प्रताप से इंद्र भी भयभीत होते थे वह तीनों लोक का स्वामी बनना चाहते थे ऐसे मे स्वर्ग पर असुरो का वर्चस्व हो जाता जो देवता नही चाहते थे, देवताओ के प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के राज्य मे दान की अभिलाषा प्रवेश किया राजा बलि उस समय यज्ञ कर रहे थे, भगवान वामन ने बलि से तीन पग जमीन मांगा, बलि ने उन्हे दान स्वरूप जमीन दे दिया, वामन जी विराट रूप लिए और दो पग मे तीनों लोक को माप लिए जब वामन देव ने तीसरा पग कहा रखुं ,बलि ने तीसरा पग अपने सिर पर रखने को कहा भगवान विष्णु उनके दानशीलता से अत्यंत प्रशन्न हुए, उन्होंने बलि को पाताल लोक का राजा बना दिया, जिससे इंद्र का स्वर्ग सुरक्षित हो गया वह दीप जला कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त किया|
दीपावली पर्व और उनके 5 दिन-
1. पहला दिन- धनतेरस
इस महापर्व के पहले दिन को धनतेरस के रूप मे मनाया जाता है इसी दिन कुबेर महराज व धनवंतरी अमृत का कलश लिए समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे, इस दिन तेरह दिये जलाने का विधान है, इस दिन कुबेर और आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरी का पूजा किया जाता है, इस दिन को त्रयोदश भी कहा जाता है|
2. दूसरा दिन -नरक चतुर्थी
दूसरे दिन को नरक चतुर्थी के रूप मे मनाया जाता है इस दिन श्री कृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध कर उनके बंदीगृह से 16,100 कन्याओ को मुक्त किया था, इस दिन को चौदस भी कहा जाता है|
3.तीसरा दिन -लक्ष्मी पूजा
तीसरे दिन का अपना अलग ही महत्व होता है इस महापर्व का मुख्य दिन होता है इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा किया जाता है साथ ही गणेश जी व सरस्वती माता कि भी पूजा किया जाता है ,लक्ष्मी जी पूजा अमावस्या की रात मे चारो तरफ दीपक जलाकर किया जाता है दीप को पवित्रता का प्रतिक माना जाता है|
4. चौथा दिन - गोवर्धन पूजा
द्रौपर्युग जब कृष्ण और कृष्ण के प्रजा के द्वारा इंद्र के स्थान पर गोवर्धन पर्वत कि पूजा की जाने लगा तो इसी बात से इंद्र देव अत्यधिक क्रोधित हुए और भारी वर्षा करवाने लगे तब श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उँगली मे उठाकर प्रजा की रक्षा किया और इंद्र के घमंड को तोड़ा, फिर प्रजाजन गोवर्धन पर्वत का पूजा कर उनका धन्यवाद व्यपित किया तभी से गोवर्धन पूजा की प्रथा चली आ रही है |
5.पाँचवा दिन- भाई दूज
इस महापर्व का पांचवा दिन भाई दूज के रूप मे मनाया जाता है, जिस तरह रक्षा बंधन मे बहन भाई के घर जाकर राखी बांधते है लेकिन इस भाई दिन भाई अपने बहन के घर जाते है बहन अपने भाई को तिलक कर रक्षा धागा बांधती है और भोजन करवाती है, ये परम्परा यमराज और उसकी बहन यमुना से शुरुआत हुआ था, एक बार यमराज अपनी बहन के घर गया था उन्होंने उन्हें आदर पूर्वक बिठा कर भोजन कराई थी, तभी से यह भाई दूज कि परम्परा चली आ रही हैं|
पाँचवा
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